मारुति सुजुकी का रक्षात्मक रुख और विदेशी कार कंपनियों का पलटवार: ऑटो बाजार में एक नए अध्याय की शुरुआत

मारुति सुजुकी इस वक्त कुछ अलग ही मोड में नज़र आ रही है। हाल ही में कंपनी ने अपने कर्मचारियों और बिजनेस पार्टनर्स के लिए खर्चे कम करने और किफायत बरतने के कई फरमान जारी किए हैं। असल में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव के बीच ईंधन बचाने और विदेशी मुद्रा का खर्च कम करने की जो अपील की थी, कंपनी उसी लाइन पर चलती दिख रही है। एक्स (X) पर मारुति ने साफ कहा है कि काम को ज्यादा से ज्यादा प्रोडक्टिव और एफिशिएंट बनाना होगा। मतलब साफ है, पेट्रोलियम की खपत घटाओ और विदेशों में होने वाले भारी-भरकम खर्चों पर लगाम लगाओ। इसके तहत अब गैर-जरूरी विदेशी दौरों पर रोक लग रही है, वर्चुअल मीटिंग्स को बढ़ावा दिया जा रहा है और कंपनी के कुछ हिस्सों में तो कोविड के दौर वाला ‘वर्क-फ्रॉम-होम’ भी वापस लौट आया है। कंपनी का मानना है कि चाहे बात राष्ट्रीय हितों की हो या खुद के बिजनेस की सेहत दुरुस्त करने की, अपनी आंतरिक प्रक्रियाओं को सुधारने का यह बिल्कुल सही वक्त है।

लेकिन मारुति की इस ‘किफायत मुहिम’ को सिर्फ राष्ट्रीय हित या रूटीन एफिशिएंसी ड्राइव के चश्मे से देखना शायद पूरी तस्वीर न हो। यह सब ऐसे वक्त में हो रहा है जब देश की सबसे बड़ी कार निर्माता कंपनी का बरसों पुराना दबदबा थोड़ा हिलता हुआ दिख रहा है। मारुति का मार्केट शेयर लगातार गिर रहा है, और यही वह दरार है जिसकी तलाश दुनिया भर की दिग्गज कार कंपनियों को सालों से थी। भारत का ऑटो मार्केट हमेशा से विदेशी कंपनियों के लिए एक टेढ़ी खीर रहा है, लेकिन अब लीडर की इस कमजोरी ने उनके लिए एक बड़ा रास्ता खोल दिया है।

इस मौके को भुनाने के लिए छोटे और ग्लोबल प्लेयर अब पूरी तरह से आक्रामक रुख अपना रहे हैं। जरा आंकड़ों पर नजर डालें तो स्टेलेंटिस, फॉक्सवैगन, स्कोडा ऑटो, रेनॉल्ट, निसान और होंडा—इन छह कंपनियों का वित्त वर्ष 2026 (FY26) तक भारतीय पैसेंजर व्हीकल मार्केट में कुल हिस्सा 5.5 फीसदी से भी कम है। दुनिया के बड़े बाजारों में राज करने वाली इन कंपनियों के लिए भारत में यह आंकड़ा किसी मजाक से कम नहीं है। लेकिन अब उनके हौसले बुलंद हैं और वे भारतीय बाजार के तेजी से बदलते मिजाज को पकड़ने के लिए नए प्रोडक्ट्स की पूरी एक फौज उतारने की तैयारी कर चुके हैं।

इन तैयारियों में सबसे ज्यादा महत्वाकांक्षी प्लान स्टेलेंटिस के ब्रांड जीप (Jeep) का लग रहा है। जीप भारत के लिए एक बिल्कुल नई एसयूवी तैयार कर रहा है जिसे 2028 में लॉन्च किया जाएगा। दिलचस्प बात यह है कि इसका प्रोडक्शन महाराष्ट्र के रंजनगांव प्लांट में होगा, जो स्टेलेंटिस और टाटा मोटर्स का जॉइंट वेंचर है, और यहीं से इसे दुनिया भर के बाजारों में एक्सपोर्ट भी किया जाएगा। सिर्फ प्रीमियम गाड़ियां ही नहीं, स्टेलेंटिस अपने सिट्रोएन (Citroen) ब्रांड के जरिए एक नई ‘स्मार्ट कार’ रणनीति पर काम कर रहा है ताकि मास-मार्केट में भी अपनी पैठ बनाई जा सके।

उधर, स्कोडा ऑटो फॉक्सवैगन इंडिया भी फुल थ्रॉटल पर है। अपनी नई सब-कॉम्पैक्ट एसयूवी स्कोडा काइलाक (Kylaq) को जो शानदार रिस्पॉन्स मिला है, उससे उत्साहित होकर कंपनी अब इसके नए वेरिएंट्स लाने वाली है। साथ ही अपनी सेडान लाइनअप का रुतबा वापस लाने के लिए वे स्कोडा सुपर्ब (Superb) की भी वापसी करा रहे हैं। इसी तर्ज पर फॉक्सवैगन भी काइलाक की सफलता से प्रेरणा लेते हुए अपनी खुद की एक सब-4 मीटर एसयूवी तैयार करने में जुट गया है।

बाजार का यह पूरा परिदृश्य अब एक बेहद दिलचस्प मोड़ ले चुका है। एक तरफ बाजार का सबसे पुराना और सबसे बड़ा खिलाड़ी अपने खर्चे कम करने और वर्क-फ्रॉम-होम जैसी रणनीतियों में उलझा है, वहीं दूसरी तरफ वो ग्लोबल ब्रांड्स हैं जो सालों तक हाशिये पर रहने के बाद अब बाजार पर टूट पड़ने को तैयार हैं। भारतीय सड़कों पर मार्केट शेयर की यह जंग अब एक बिल्कुल नए और आक्रामक दौर में प्रवेश कर रही है।

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