"पेट्रोल के बढ रहल कीमतन के बीच आखिर साइकिल चुनला का जगह अउर कवन रास्ता रहे उत्तर प्रदेश का जनता का लगे?" उत्तर प्रदेश के चुनाव परिणाम अइला के बाद हमार एगो मित्र कहलन। बात भले मजाक में कहल गइल रहे, लेकिन शायद महंगाई के रोक पाये के विफलता एह चुनाव में कांग्रेस पर भारी पडल। उत्तर प्रदेश के जनता शायद झुठा वादा से अगुता गइल रहे, अउर एगो नया चेहरा के आगे कइल चाहत रहे, जे ओह लोगन के दुख-दर्द के समझो, अउर साइकिल रैली के दौरान अखिलेश यादव के अंदाज लोगन के भा गइल।रहल बात मायावती के, त उनका काम से बेसी भरोसा अपना जति-धर्म के समीकरणन पर रहे। आखिर प्रदेश के जनता अइसन नेता के कइसे चुनो, जेकरा राज में आम आदमी त भूखा मरत रहे, लेकिन उनका निर्जीव मूर्तियन के सुरक्षा के चिंता सतावत रहे। प्रजातंत्र जनता के चुनल प्रतिनिधि लोगन द्वारा चलावल जाला, त फेर आखिर ओह नेता के मुख्यमंत्री कइसे चुनल जाव, जे आम जनता से मिलला का जगह हर उदघाटन अउर काम अपना मुख्यमंत्री आवास में बइठ के निपटावत होखे? चुनाव से ठीक पहिले "ब्राह्मण शंख बजायेगा, हाथी दिल्ली जायेगा" जइसन नारा बुलंद करे वाली मायावती खातिर उत्तर प्रदेश के ई झटका काफी कुछ सिखा गइल।
वइसे एह फैसला के सबसे बेसी फायदा जेकरा मिलल बा, ओह समाजवादी पार्टी खातिर भी ई परिणाम काफी हद तक चौंकाये वाला बा। तमाम एक्जिट पोल अउर चुनावी पंडित लोग सपा के 150-160 सीट मिलला के घोषणा कइले रहे, लेकिन प्रदेश के जनता शायद विधायकन के पाला बदले के आदत से तंग आ चुकल रहे, अउर एक पार्टी के पूर्ण बहुमत दिहल चाहत रहे। मुलायम सिंह के समाजवादी पार्टी के डीपी यादव सरीखा लोगन के दूर राखे के ई इनाम मिलल, जवना से जनता में ई संदेश गइल कि समाजवादी पार्टी गुंडागर्दी से खुद के दूर राखी।
सही मायना में कहल जाव, त ई जीत मुलायम सिंह से बेसी अखिलेश के हवे, जिनका रुप में जनता एगो अइसन व्यक्ति के चुनले बिया, जे निर्विवाद बा, जेकरा पर कम से कम अभी ले कवनो गंभीर आरोप नइखे लागल। एक ओर जहां ई जीत समाजवादी पार्टी खातिर एगो नया दौर के शुरुआत बाटे, ओहिजे दोसरा ओर ओह लोगन पर जनता के अपेक्षा पर खरा उतरे के चुनौती भी बाटे। अगर समाजवादी पार्टी 2014 के लोकसभा चुनाव से पहिले अपना आप के साबित कर पावल त एह देश में तीसरा मोर्चा पुनर्जीवित हो सकेला, ना त फेर अगिला कई सालन ले ऊ लोग हाशिया पर चल जाई।
वइसे त पिछला बीस सालन में उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के कवनो खास पहिचान नइखे रह गइल, लेकिन रायबरेली अउर अमेठी जइसन कांग्रेस के गढ मानल जाये वाली सीटन पर कांग्रेस के हार यूपीए सरकार खातिर एगो खतरा के घंटी हवे। अगर अबो ई सरकार ना चेतल, अउर घोटाला के परछाई से बहरी निकल के महंगाई अउर भ्रष्ट्राचार पर लगाम ना लगवलस, त फेर 2014 के लोकसभा चुनाव के राह आसान नइखे लउकत। भाजपा, बसपा अउर अन्य पार्टियन खातिर भी ई एगो सीखे के समय बा, ओह लोगन के बुझे के चाहीं कि जनता के बड-बड वादा से ना, जाति-धर्म के समीकरणन से ना, बल्कि ओह मुद्दा से सरोकार बा, जे ओकरा से सिधे जुटल बाटे।
आजादी के पैंसठ बरिस बाद भी देश के सबसे बडहन, अउर देश के राजनीति में आपन खास दर्जा राखे वाला एह राज्य में अगर आजो रोटी, कपडा, मकान अउर बेरोजगारी जइसन मुद्दा हावी बा, त एकरा खातिर हर ऊ पार्टी जिम्मेदार बिया जे कबो ना कबो उत्तर प्रदेश में, अउर एह देश में राज कइले बिया। राजनीति के एह हमाम में हर केहु नंगा बा, अउर जनता एक के बाद दोसरा में विकल्प तलाश रहल बिया। चुनाव जीत के आइल विधायकन के ई समझे के चाहीं कि प्रदेश के जनता बहुत उम्मेद का संगे ओह लोगन के जितवले बिया, कोशिश होखे के चाहीं कि निर्जीव मूर्तियन का जगह पर जीयत-जागत इंसानन पर सियासत होखे, लोगन के जीवन-स्तर सुधारे के कोशिश होखे, कुछ अइसन होखे, जवन उत्तर प्रदेश के अगर 'उत्तम प्रदेश' ना, त कम से कम 'बेहतर प्रदेश' बना सको।



राहुल जी गाँधी के समझ में अब आ जाये के चाहीं कि यूपी-बिहार के प्रति उनकर देखावटी चिंता आ भाषण में सांचो कवनो दम नईखे।