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पुरनका बरगछ (कहानी)

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लेखक परिचय : मूलत: गोपालगंज जिला के निवासी संजीव सिंह जी नवहा पीढी के एगो सशक्त रचनाकार बानी। फिलहाल गाजियाबाद में रह रहल संजीव जी के रचना में भोजपुरी भाषा आ संस्कृति के प्रति लगाव, आ ओकरा विकास खातिर प्रयास करे के जज्बा साफ दिखाई देला। हमनी के सहयोगी वेबसाइट जय भोजपुरी डॉट कॉम पर प्रकाशित ई कहानी सामाजिक अउर आर्थिक रुप से पिछडल एगो परिवार के दर्द बयान कइला का संगे-संगे हमनी के सामाजिक ताना-बाना पर भी कई गो सवाल खडा कइ रहल बाटे। - संपादक
 
कुहासा ऐतना पडल रहुवे कि ई मालूम कईल, अंधरीया हवे कि अंजोरिया, असंभव लागत रहे। अईसन बुझात रहे कि जईसे पुष महीना के ई रात काल के रथ प सवार हो के पृथ्वीलोक प विचरण करे निकलल बावे। दुर-दुर तक धुंध ही धुंध। ना कवनो जीव-जंतु लउकत रहुवे सन अउर ना कवनो गाछ-वृक्ष। पुरनका वरगछ के निचा टप-टप ओस गिरला के आवाज सुन के कबो-कबो मन मे ई ख्याल आवे कि कही कवनो भूत-प्रेत के आगमन त नईखे होत। सभ लोग अपना-अपना घरे रजाई-कमर मे लुकाईल आराम करत रहे भा ई कही कि ऐह करीया रात के बिते के पेडा जोहत रहे। अउर ई रात रहे कि जईसे ठेहा ही लगा देले रहे।
 
पुर्णवासीयो अपना मेहर अउर तीनु लईकन के साथे टुटल मडई मे लूका के ऐह रात के धोखा देवे के नाकामयाब कोशिश करत रहे। हरीजन समुदाय से संबंध रखला के वजह से इनकर मडई रूपी घर भी गांव के बहरी रहे। जहाँ चारू ओर बस सरेह ही सरेह अउर बीच मे अकेला पूर्णवासी राम के मडई। मडई भी अईसन कि ओस के दु गो बुँद मे से एगो छप्पर के निचा चल आवे। पूरूवा बहे त पुरूब के टाटी तुर के पश्चिम के राहे आगे बढ जाव। अउर ऐही मडई मे पुर्णवासी के परीवार शीतलहरी से शीतयुद्ध करत रहे। पुअरा के बनावल तरई (चटाई) पर अखहरे सुत के ऊपर से फाटल अउर मईल कुच-कुच कमर, जवन शायद पिछला साल कवनो दानवीर दान कईले रहे, ओढ के पुरा परीवार ठंढ के मारे ठिठुरत रहे लोग। लईकन के शायद अंघी लाग गईल रहे बाकीर पुर्णवासी के आँख अभीयो कबो अपना परीवार के निहारे मे त कबो छप्पर से चुऐ वाला ओस के देखे मे लागल रहे। चमेलीया (पुर्णवासी के मेहर) कबो अपना देह के कमर मे लूकावे त फेर कबो उठ के बईठ जाव अउर टोह लगावे कि रात केतना बित गईल।
 
अभी रात के शायद एगो पहर बितल रहे। तब तक चमेलीया के बईठल देख के पूर्णवासी कहलन...
 
-  का ऊठक-बईठक कईले बाडे रे? अंघी कहाँ रखले बाडे? हेतना रात भईल, भोरे सुतबे का?
-  ई मुदई रात सुते देवे तब न केहु सुती। डाईन नियन त पूरूवा चलत बिया। का केहु सुती आ ना सुती।
-  चुप-चाप मुह तोप के सुत जो। देख हई छोटका के गोड उघारे बा, तोप ऐकरा के। कही पाला मार दी त ऐढम-छोड-डेढम लाग जाई।
 
ऐतना कह के पूर्णवासी खुदही तिनू लईकन के कमर से तोपे लगले। फेर चुप-चाप गाल प हाथ रख के बईठ गईले। जब चमेलीया के नजर उनका प पडल त कहलस...

-  ऐ रत्नेशवा के बाबु! तहरो अँखीया नईखे झपत का हो?
-  चुप ससुरी! पाला पडत बा जे प्राण निकाल ली अउर ईनका झपकनी के लागल बा।
-  हई चहुवो बडा तबाह कईलस रे रत्नेशवा के माई! बुझात बा एकर दरद त हमरे संगे जाई। ओह...ओह...ह जिये ना दिही ई दरद।
-  सुरती दाब ल दँतवा मे। राहत करी...।
-  अबहीये त फेकनी हई। तनी देख ना घईलवा मे पानी बा की ना। बडा तरास लागल बा रे…।
-  होई! सँझीये खान भरले रहनी हई। विलूम जा, देत बानी।
 
चमेलीया उठ के गईल आ फुटल गर्दन वाला घईला मे से एक गिलास पानी पूर्णवासी के दे दिहलस।
-  तनी देखबे रे...। बोखारो बा का? देहीया मे बडा जलन होत बा।
-  तहार देहीया त जरत बा हो...। कईसे बरदास करत बाडऽ।
-  ई जलन त बरदाश हो जात बा बाकीर लईकन के हई हालत देख के जीयल नईखे जात।
-  अब का कईल जाई? कही से राड्ही लेले अईह। एको पाँजा होई त मडईया के पुरबारी अलंगीया ठीक कर दियाईत। अरे पुरूवे जब बहेले त डर रहेला...।
-  राड्ही का तोहरा बाबुजी के जमीन मे बा जे ले आई?
-  बाबु साहेब आपन तरकुल झारे के कहले बाडे। सोचत बानी उनका से कुछ ताड के पतई माँग ली। ओकरे से आड कर दियाई।
 
चमेलीया अबकी कुछ ना बोलल। वापस जाके सुत गईल। पूर्णवासी अभीयो ओहीगन बईठल ना जाने का सोचत रहले। ठंडा अब बढत जात रहे। बयार भी अब तेज बहे लागल रहे। एक बार त अईसन लागे कि बस पल भर मे ही बर्फ गिरल चालू हो जाई।
 
मजदुरी कर के पेट भरे वाला पूर्णवासी खतीरा राड्ही के इंतजाम कईल भी, केवडा के फुल खोजला से, भारी रहे। सुबेरे से साँझ तक मजदुरी कईला के बाद भी अपना परीवार खतीरा भर पेट अन्न जुटावल त मुश्कील रहे, पाला से बाँचे खतीरा उपाय कहा से करस। फाटल पुरान कपडा, जे केहु दे देवे ओकरे के, पुरा परीवार मिल बाँट के पहीन लेवे। शिक्षा का होला ई पूर्णवासी के मालूम ना रहे अउर ना ही मालूम करे समय रहे। अगर कबो समय मिल भी जाव त हालात मजबुरी बन के खुँटा गाड देवे।
 
पानी के गिलास हाथ मे लेले पूर्णवासी ना जाने कब तक ले ओही त बईठल रह जईते अगर रत्नेशवा के कोहरे के आवाज ना सुनाईत। गिलास निचा रख के जईसे ही लईका के छुअले...।

-  अरे ऐकरो मथवा गरम हो गईल बा रे...।

जब चमेलीया छुअलस...।
-  ई त चईलीयो के आगी से जादा गरम बावे...।
 
लईका अब आँख मुदले कबो बाबू कबो माई पुकारे लागल।
 
-  हँ बोलऽ! हमनी ऐही जा बानी सन...
-  का कहत बाडऽ बोलऽ ना...
-  पानी पियबऽ...। तनी पानी ले आव। रत्नेश, ऐ रत्नेश...
-  बोल ना बाबु कुछ त बोल...। ऊठऽ त हई पानी पिय त...।
 
दुनु बेकत के लाख उपाय कईला के बाद भी जब रत्नेशवा के होश ना आईल त व्याकुलता बढे लागल। कही कवनो अनहोनी ना हो जाव एकर डर लागे लागल। चमेलीया के आँख मे लोर के तुफान आवे के काम लगा देले रहे। रोअत कहलस – “लईका के तबीयत त ढेर खराब बा। हिमाचल बाबु किंहा ले चलल जाव?” रत्नेशवा के गोदी मे लेले ढभढभाईल आवाज मे पूर्णवासी कहले – “हेतना रात मे कहाँ ले चलल जाई? बहरी त पाला परत बा, तबीयत अउर खराब हो सकत बा। आ हिमाचल बाबु मंगनी मे ईलाज ना नू कर दिहे।”
 
"हाथ-गोड जोडल जाई...। निहोरा-पाती कईल जाई...। लईका के कुछवु हो जाई त का करेम सन जी के...? जिनगी भर हिमाचल बाबु के गुलामी कईल जाई...। कुछवु करे के पडो बाकीर ले चले को हिमाचल बाबु के लगे...।” आँख से लोर टपकावत चमेलीया पूर्णवासी से कहलस।

रत्नेशवा के हालत बिगडल जात रहे। बाकीर पूर्णवासी के समझ मे ना आवत रहे कि आखीर करस त का करस। हिमाचल बाबु के फिस अउर दवाई के दाम कहा से आई? का मान जईहे ऊ बिना फिस के? अगर देखावल ना गईल त तबीयत अउर खराब हो जाई? अईसने कुछ सवाल, जवना के जबाब पूर्णवासी के लगे ना रहे, उनका मन मे आवे लागल। लगही सुतल दुनु लईका भी जाग गईलन सन। चमेलीया के रोऐ के आवाज तेज होखे लागल रहे। अउर पूर्णवासी अभी तय भी ना कर पाईल रहलन कि आखीर करस का? माई के रोअत देख के दुनु लईका भी रोऐ लगलन सन। अउर रत्नेशवा के आँख खुले के नाम ही ना लेत रहे।
 
अंत मे पूर्णवासी तईयार हो गईलन रत्नेशवा के हिमाचल बाबु किंहा ले जाऐ खतीरा। जवन कमर रहे ओकर मे रत्नेशवा के लपेट के कान्हा प रख लेहले। छोट लईकन के घरही रूके के कहले बाकीर ओकनी के रोअत देख के साथ ही ले जाऐ खतीरा तईयार हो गईले।
 
आगे-आगे पुर्णवासी रत्नेशवा के लेले, बिच मे छोटका दुनु लईका अउर पिछे रोअत-चिल्लात चमेलीया एगो उम्मीद के सहारे हिमाचल बाबु के डेरा के तरफ बढत चल जात रहुवे लोग। पाला के रूप अब खतरनाक भईल जात रहे। पुष के ई रात भयानक रुप धर लेले रहे। चारू तरफ बस कुहासा-ही-कुहासा अउर ओही मे राह टोअत पूर्णवासी अपना परीवार के संगे आगे बढत रहले।
 
ना जाने का होई हिमाचल बाबु के लगे...। रत्नेशवा ठिक हो भी पाई कि ना...। का हिमाचल बाबु के हमरा प रहम आई...? पूर्णवासी ऐही उधेडबुन मे लागल रहले कि पुरनका बरगछ के निचा ठेस लागल अउर रत्नेशवा के लेले निचा गिर गईले। निचा गिरला से रत्नेशवा के जब चोट लागल त एक बार माई कह के चिलाईल फेर अचानक चुप हो गईल। पुर्णवासी जल्दी से उठ के ओकर नब्ज पकडले बाकीर ठंडा के मारे कुछु मालुम ना पडल। जब साँस देखले त उदास अउर भारी भईल मन से चमेलीया से कहले – “बुझात बा रत्नेशवा ना रहल...।”
 
ऐतना सुनला के बाद चमेलीया के होश उड गईल। अपना आँखी के सामने अपना बेटा के मरल देख के चमेलीया के अईसन सदमा लागल कि उहो अपना प्राण के शरीर से निकले से रोक ना पाईल। ओकरा मुह से जवन आखरी शब्द निकलल ऊ रत्नेशशशशशशशश... रहे। ई सबकुछ देखला के बाद भी पूर्णवासी के बुझात ना रहे कि ई का हो गईल। दुनु छोट लईका कबो माई के शव के लगे जा सन त फेर कबो बाबु के लगे। ऐनो पाला भी आपन कयामत देखावे लागल। अब ऐतना जोड के ठंडा हवा बहे लागल कि पुरनका बरगछ के भी बस के ना रहल कि पूर्णवासी अउर उनका दुनु लईकन के पाला के प्रकोप से बचा सको।
 
लोग कहेला कि मर्द के कबो दर्द ना होला बाकीर अपना पत्नी अउर लईका के विक्षोह मे पूर्णवासी के रोअत देख के केहु भी कह सकत रहे कि जेकरा दर्द ना होला ऊ असली मर्द ना होला। ना जाने कब तक ले पूर्णवासी ओही अवस्था मे पडल रहुवन ऐही से ईहो ना भनक लगुवे कि पाला के नयका शिकार उनकर दुनु लईका भी हो गईलन सन। पहीले रत्नेशवा फेर चमेलीया अउर अब छोटका दुनु लईका के साथ छोड दिहला प पूर्णवासी अकेला कईसे जिंदा रहीहन, ईहे ऊ सोचत रहले। बाकीर जब कवनो जबाब ना मिलल त बारी से चारू शव के पास फेर कबो पुरनका वरगछ के जड तर जाके मुडी रगडस..। बाकीर ना ई सभकुछ कईला के बाद भी उनका परीवार से केहु उठ के ई ना कहल कि हम जिंदा बानी। पुरनका बरगछ के जरी पूर्णवासी मुडी गडले रात भर रोअत रह गईले।
 
पुष के महीना के ई रात कुहासा के रूप मे जवन जहर फईलवले रहे अउर जवन जहरीला बयार बहत रहे ओकरा से एगो पुरा परीवार तबाह हो गईल रहे अउर केहु के भनक भी ना लागल रहे। जब सुबेर भईल आ दिन खुलल त लोग बाहर भितर जाऐ लागल। गांव के लोग के नजर जब पुरनका बरगछ प पडल त पुरा गांव मे हाला हो गईल। पूर्णवासी के परीवार...पुरनका बरगछ...पुरा परीवार...। चिते सुतल रत्नेशवा बगल मे चमेलीया आ ओकरा गोड के लगे छोटका दुनु लईका। ऐतने ना पुरनका बरगछ के जड के लगे मुडी गडले पूर्णवासीयो आपन प्राण त्याग देले रहले।
 
लोग तरह-तरह के बात बनावे लागल। केहु कहे गरीबी से तंग आके पुरा परीवार आत्महत्या कई लिहल। केहु कहे भूत-प्रेत के हवा मे पूर्णवासी के परीवार धरा गईल। केहु कहे कवनो चोर-लुटेरा पूर्णवासी के लुट गईल। बाकीर सच्चाई का रहे ई शायद भगवान जानत रहले भा खुद पूर्णवासी के परीवार। ठंढ ऐतना जादा रहे कि दिन मे भी लोग साल-कमर ओढले पुरनका बरगछ के घेरले रहे अउर सबकुछ खत्म हो गईला के बाद भी पूर्णवासी के परीवार ओही त बिना साल-कमर-रजाई सुतल रहे जे त रात मे पाला से युद्घ कईले रहे। बाकीर तबो भी केहु के ऐह हादसा के असली बजह ना मालूम भईल। अउर पुरनका बरगछ सबकुछ जनला के बाद भी धृतराष्ट्र नियन अईसे मुडी उपर कईले रहे जईसे ओकरा कुछ मालूम ही नईखे।
 
 
Comments (5)
Thanks
1 Sunday, 25 December 2011 15:24
Dharmender singh
Good afternoon
Sanjay je . My name is Dharmender singh. I am belong from siwan in Bihar.
I have read your story. I am very happy. and thanku very much. I will requested that please written any story poem etc. And I wish You A very happy chrismas and happy new year 2012
And Vasant panchami.
Dharmender singh
Thanks
2 Saturday, 14 January 2012 19:40
Deenbandhu Mishra
संजय जी एह काहानी के पढ़ला के प्रेमचंद के लिखल "पूस की रात" याद अा गइल। बहुत बढ़ीया काहानी बा एह खातीर रुउरा के धन्यवाद।

दीनबंघु मिश्रा
(आरा) बिहार
कम्बल वितरण के उद्योग लेबे वाला आदमी के कमी हो गईल बा
3 Tuesday, 28 February 2012 00:50
संतोष साह
कहानी त ठीक बा .......... पुष की रात से प्रेरित जरुर बा........ लेकिन सारा परिवार ठंड से मर गईल इ बात कुछ हजम न भईल...... खैर कम्बल वितरण के काम चलत रहे के चाहीं.........ताकि ये तरी के हादसा फेर से ना हो पावे..........वैसे कहानी खातिर धन्यवाद !!!
dardnak
4 Thursday, 08 March 2012 22:20
vivek
hum sab bhojpurai log ke e batawe ke chahatani ki hamra e kahani bahut nimam lagal ha.
aa hum lekhak bhai ke iho batawe k chahatani ki bhai hamahu gopalganj jile se hain aa tu jila ke naam rosan ka dihala .
bhojpuri
5 Sunday, 01 September 2013 23:00
Ajit Avinash
kahani bahut hi nik lagal.
bakir ago baat ba . agar kahani ako go sadasya jinda rah ke samaj ke badale ke koshish kaile rahit ta e kahani auri sundar ban gail rahir .
dhanyawad