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कार्टून देखल एगो मजेदार आदत

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(लेखक परिचय: मूलत: देवरिया जिला के निवासी चन्द्र प्रकाश दुबे जी भोजपुरी लेखन में एगो नया नांव हईं। फिलहाल बंगलुरु में कपडा के व्यवसाय में लागल दुबे जी के कई गो रचना पहिले अखबारन में छप चूकल बाटे। हमनी के सहयोगी वेबसाइट जय भोजपुरी डॉट कॉम पर छपल ई समसामयिक आलेख टीवी पर आ रहल कार्टून के प्रभाव पर आधारित बाटे।)

आजूकाल्ह सब भारतीय घरन में लईकन के कार्टून देखल एगो मजेदार आदत बनी चुकल बा। लईका एके बस देखत नईख सन भालुक ओकरा से अपना के जोड़ी दे ताड़ सन। उन्हनी खातिर कार्टून देखल एगो रोमांचकारी अनुभव बनी गईल बा। कार्टून में लउके वाला जिव- जंतु(जानवरन) चरित्रन के द्वारा इंसानी हाव भाव अउरी बोली के अभिनय कईल लईकन के बहुत पसन बा। लगभग हर घर में लईकन के टेलीविज़न के सामने बईठी के कार्टून देखत देखल जा सकेला। इ लईका कुल्ही कार्टून देखला में एतना रमी जा ताड़ सन की खाईल पियल,पढाई लिखाई, घर में केहू के आयिल गईल तक भुला जा ताड़ सन। इ प्रक्रिया लईकन के धीरे धीरे असामाजिक (मिलनसारिता में कमी, जेठ बड़ के आदर में कमी, अरह्वल के अनसुना कईल) बन रहल बाड़ सन। लगभग हर परिवार ऐसे कब्बो ना कब्बो उबिया जरूर जात होई।

लईकन के सक्रियता कई गो माने में बड आदमी से अधिक सजग आ संवेदनशील होला। कार्टून में देखावे जाए वाला दृश्य, बोलल जा रहल संवाद आ तेजी से बदलत कथाक्रम सब के सब लईकन के संवेदित करेला। एतना सब होखला के चलते इ लईका एगो दर्शक भर ना होके एहपर बड़ा अचंभित करे वाला प्रतिक्रिया तक दे ताड़ सन। लईका घंटों बईठी के पोगो, कार्टून नेटवर्क, निकलोडियन, हंगामा, डिज्नी चैनल, निक चैनल के बड़ा चाव से बिना उबिययिले आ थाकल देखत रह ताड़ सन। कार्टून के एतना असर बा की लईका रोज रोज की बात बेवहार में कार्टून के नक़ल कर ताड़ सन, टाफी, चाकलेट, कार्टून चरित्रन के पहिनल कपडा, फोटो, स्टिकर माने कार्टून से जुडल हर चीज के मांग कर ताड़ सन। आ कार्टून से जुडल सब चिझु बाजार में मिळत भी बा। कुछ साल पहिले शक्तिमान ड्रेस बड़ा धूम मचवले रहे, जे समरथ रहल उ किनी दिहल जे ना रहल ओकर लईका रोवल माई बाप मन में रोवल।

इ त कार्टून से जुडल उपरी बात रहल ह।

शुरूआती दिन में भारतीय बाल मन पर कार्टून चरित्रन के परभाव बहुत कम रहल। मनोरंजन के हिसाब से लईका कारटूनन के देखत जरूर रहल सन लेकिन एकरा बहाव में बहत ना रहल सन। भौगोलिक-सांस्कृतिक अंतर भी एगो मुख्य वजह रहल जवन लईकन के पूरा के पुरा कार्टून बाज़ार से न जोड़ पावत रहे। एहिजा से भारतीय कार्टून की क्षेत्र में बाजार वाद के समहूत भईल। भारतीय कार्टून विशेषज्ञ लो अईसन उपाय खोजल शुरू कईल लो जवन भारतीय बच्चन के विदेशी कार्टून की तरह उत्तर आधुनिक पूँजी संस्कृति से जोड़ी सके। एगो बड़का चुनौती भी रहल की कि गढल गईल कार्टून चरित्र सामाजिक रूप से भी प्रासंगिक होखे के चान्ही। आ ओमे एतना समरथ होखे की, लईका ओसे अपनापन भी महसूस कर सक सन। खोजबीन के एही क्रम में कार्टून इंडस्ट्री के लोग भारतीय मिथक के ‘सुपर हीरो’ हनुमान अउरी गणेश के चुनल लो। इ मिथकीय नायक ‘बैटमैन’, ‘हीमैन’, ‘पोकमैन’ की जयिसने करिश्माई रहल लो।जेकर सामाजिक सांस्कृतिक सामाजिक महत्तव भी रहे, अउरी मिथकीय नायक में- कृष्ण।बलराम, लव।कुश, घटोत्कच, छोटा भीम, राहु।केतु, गुरु शुक्राचार्य, नारद मुनि, ब्रह्म, विष्णु, शिव रहे लो।

इ त बाजारवाद भईल

आज कल टेलीविजन पर प्रसारित होखे वाला प्राय: कार्टून उ पश्चिमी समाज के प्रतिनिधि चेहरा सामने राखता जवन आजकल अलगाव आ बिखराव की स्थिति में अक्सर अटपट आ अजीबोगरीब हरकत करेला। अईसन कार्टून भारतीय बच्चन के भीतर नकारात्मक प्रभाव डालला के आलावा तनाव, अवसाद आ हीनभावना जईसन प्रविरती के बढ़ा रहल बा। आजकल की कार्टुनन में बहानाबाजी, लड़ाई, छोटे उमिर में प्रेम, गुटबाजी, हर बात खातिर कवनो गाडजेट (यंत्र) प निर्भरता के पाठ पढ़ा रहल बा। अब मिकी माउस, टाम एंड जेरी वाला धमाचौकडी, बाल सुलभ शरारत कहाँ लउकता।एक तरह से कहल जाऊ त लईकन के लड़ीकाँइ छीन रहल बा।

दू चार गो सामाजिक सरोकार से वास्ता रखे वाला कारटून(मुख्यतः धार्मिक चरित्र आ नायक प) अपना देश में भी बनल ह जवन काफी लोकप्रिय भी बा। इ ए बात के संकेत बा की अगर अपना देश, संस्कृति, भाषा, धर्म आ लोकाचार से जुडल कार्टून बनावल जा उ समाज निर्माण के साथ कमाई भी दे सकेला। लेकिन अभी भी अपना देश में लईकन के सोच, तर्क आ सीख देबे वाला कारटून के कमी लउकत बा। जेसे समाज के बुनियाद कमजोर हो रहल बा। जब कवनो लईका कुछु देखेला त साथे साथ उ सोचत भी रहेला।

लईका जवना नज़र से दुनिया के देखे ल सन, अपना चारों ओर के प्रति उन्हनी के जवन भावनात्मक आ नैतिक प्रतिक्रिया होला ओहमे एगो विशिष्टता, बालसुलभ सरलता, निष्कपटता आ एगो खास किसिम के बारीकी होला। बच्चन के उन्हनी के चारों ओर के दुनिया से एह तरह से जोड़े के चाहि कि उ हर दिन ओयिमे से कवनो नाया बात खोज सन। आज कल के समय में जब लईका स्कुल आ गृहकार्य के आलावा अधितर समय टीवी के सामने बितावत बाड़ सन त उन्हनी के सोच कवना दिशा में जा रहल बा एकर कल्पना कईल भी डेरा देबे वाला बा। दोष हमनिके बा जे लईकन के सामने अईसन चीज परोस रहल बानी जा। निमन सोच आ संस्कार पंचतंत्र, अमर चित्रकथा, जातक कथाएँ, हितोपदेश के पात्र जईसन कारटून चरित्र से गढल जा सकेला। आज कल टीवी प आवत कारटूनन से ना।
 
जय हिंद, जय भोजपुरी।
 
 
Comments (1)
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1 Sunday, 18 March 2012 15:17
Dehati pandit
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