Home Culture Festivals छठ पर विशेषः रुनकी-झुनकी बेटी मांगीला...

छठ पर विशेषः रुनकी-झुनकी बेटी मांगीला...

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छठ - दो अक्षरों का चार दिनी त्योहार। लोक आस्था का महापर्व। कोई आडंबर नहीं। साफ-सफाई का खास ख्याल।

दिवाली में जहां घरों की सफाई होती है, छठ में उससे आगे बढ़कर गलियों, सड़कों और नदियों-तालाबों के किनारों की। कहीं कोई गंदगी नहीं हो - यह ख्याल पूजा के पकवान बनाने से लेकर सूर्य को अर्घ्य देते समय खास रखा जाता है। नदियों-जलाशयों-सूर्य-फलफूल यानी पूरी प्रकृति की आराधना का अवसर।

उदीयमान के साथ-साथ अस्ताचलगामी सूर्य को भी अर्घ्य देने की परंपरा इसे दूसरे पर्वों से बड़ा बनाती है। जिसने दिन भर हमें रोशनी दी, ऊर्जा और तेज दिया, उसके डूबते रूप को भी नमन। अगले दिन का अर्घ्य उदीयमान सूर्य को दिया जाता है। यानी जो अभी उदित नहीं हुआ है, लेकिन पारखी नजरें ताड़ जाती हैं कि तेज का उदय होने वाला है। वाकई दृष्टि का इससे अच्छा उपयोग और कुछ नहीं हो सकता।

और जब यह पर्व लोक समाज में इतने गहरे तक पैठा हो तो स्वाभाविक है कि इसके गीत भी निरर्थक तो होंगे नहीं। इन सारगर्भित गीतों का मतलब और मकसद समझना जरूरी है। छठ व्रत के बारे में कहा जाता है कि यह पुत्र प्राप्ति के लिए किया जाता है। लेकिन छठ का एक गीत यह भी है कि रुनकी-झुनकी बेटी मांगीला, पढ़ल पंडितवा दामाद- ए छठी मइया...।

अब कई पीढ़ी पहले की औरतों की कल्पना देखिए। वे अपने आंगन में दौड़ने वाली एक प्यारी-सी बेटी की कामना करती हैं। लेकिन साथ ही उसके लिए एक दामाद की भी कल्पना कर लेती हैं। दामाद धन्ना सेठ हो या न हो, गीतों में इसकी चर्चा नहीं है। उसकी जगह पर पढ़े-लिखे युवक की कल्पना और इच्छा की गई है। 'गेहूं और गुलाब' नहीं पढ़ने वाली और मानव शरीर की संरचना में दिमाग का स्थान सबसे ऊपर होता है इसकी औपचारिक जानकारी नहीं रखने वाली औरतों की यह इच्छा वाकई गजब की है। यानी पढ़ाई-लिखाई मनुष्य के लिए जरूरी है, पैसा उसके बाद - इस गीत से यह बिल्कुल साफ हो जाता है। यदि हम इसे आत्मसात कर लें तो यकीन मानिये कन्या भ्रूण हत्या रोकने के लिए हमें किसी अभियान की जरूरत नहीं पड़ेगी।

गंगा माई के ऊंची रे अररिया ऊपर चढ़लो ना जाय ...। यानी व्रती घाटों की स्थिति को लेकर चिंतित हैं और इस गीत में एक व्रती औरत अपने भाई से यह निवेदन करती है कि तुम घाट को सुगम बनवा दो। ताकि वहां तक पहुंचने में आसानी हो। इस पूरे गीत में यह नहीं कहा गया है कि तुम मेरे घाट तक पहुंचने की व्यवस्था करा दो बल्कि पूरे घाट को दुरुस्त कराने की मिन्नत ताकि किसी भी छठव्रती को कोई परेशानी न हो। 'स्व' से उठकर 'पर' की चिंता।

एक आधुनिक गीत है - अबकी के गेहुआं महंग भइले बहिनी छोड़ि देहूं ए बहिनी छठी के वरतिया...। लेकिन बहन अपने भाई से साफ-साफ कह देती है कि नाही छोड़ब ए भइया छठि के वरतिया। आर्थिक मंदी के दौर में भी कोई महिला छठ व्रत छोड़ना नहीं चाहती बल्कि महंगाई उसके रास्ते में कहीं नहीं आती। चीजों के भाव आसमान छू रहे हैं लेकिन उत्साह में कोई कमी नहीं। निष्ठा और समर्पण का ऐसा भाव। पीढ़ी-दर-पीढ़ी गाए जा रहे इन गीतों का मतलब समझकर अमल करने की कोशिश जरूरी है, तभी हम छठी मइया की अनुकंपा के पात्र हो पाएंगे। (साभार: नवीन कृष्णा / नवभारत टाइम्स)

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